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बसंत

याद आता है वो बसंत...... भारत में पूरे साल को छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। फूलों पर भर भर भंवरे भंवराने लगते। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु देवी, सरस्वती और कामदेव की पूजा होती| यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी के नाम से भी उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। बसंत का प्रतीकात्मक शुभ रंग पीला है और इस दिन पीले चावल और लड्डू का अपना ही महत्व है। मुझे याद है जब हमारे गांव में वसंत आता था तो आम के पेड़ों में बौर खोजे जाते थे, और उस बौर की सुगंध आज भी मन में बसी हुई है| हमारे नए पीले रंग वाले कपड़े आते, दादी-बाबा से लेकर मां-पिता, बुआ, बहन-भाई सब एक ही रंग में रंगे होते जैसे सब ने कोई यूनिफार्म पहन रखी हो।...

बचपन मे दादी के मुँह से एक लोक कहावत बहुधा साँझ सवेरे सुना करती थी मै यथा : बसो तेरी गोद में, उखाडों तेरी दाढ़ी ॥ आज दिल्ली मे अराजकता का जो लाइव कास्ट हुआ उसने उपरोक्त कहावत को पूर्णत: चरितार्थ कर दिया !क्या किसी देश का लोकतंत्र इतना उदार हो सकता है कि कुछ लोग देश के एक विशेष हिस्से को, एक विशेष भूभाग को देश से अलग करने की सामूहिक घोषणा कर रहे हो और देश धैर्य धरे मौन उनकी मूर्खतापूर्ण अराजकता को सहन कर रहा है वह भी तब जब मात्र एक दिन बाद हम दुनिया के सबसे सुंदर संविधान का स्थापना दिवस ( बर्थ डे ) मनाने की तैयारी मे लगे हो ? आज दिल्ली मे जो हुआ है उसे केवल हम आप ही नही देख रहे है बल्कि उसपर आज सारी दुनिया की नजर पहुँची है ! आज केवल हम आप ही नही जान पाए है बल्कि पूरी दुनिया जान, समझ, पायी है कि : 1947 मे आजाद हुई हमारी भारत माता की छाती पर गुलामी के कितने गहरे शूल अभी बाकी हैं ? गद्दारी और बटवारे का सपना पाले कितने अराजक तत्व देश के भीतर अभी जिन्दा है ! ऐसे अराजक तत्वों का मर्दन जरूरी हो गया है वह भी देश के गणतंत्र प्रणालि के द्वारा ! जरूरी हो गया है कि देश के गण के लिए 26 जनवरी 1950 को लागू किए गए सुंदर तंत्र का सख्ती से प्रयोग करते हुए इन अराजक चेहरो को, इन अराजक तत्वों को सबक सिखाया जाए ॥ ============================भारद्वाज अर्चिता 25/01/2020

बचपन मे दादी के मुँह से एक लोक कहावत बहुधा साँझ सवेरे सुना करती थी मै यथा :                       बसो तेरी गोद में,                     उखाडों तेरी दाढ़ी ॥  आज दिल्ली मे अराजकता का जो लाइव कास्ट हुआ उसने उपरोक्त कहावत को पूर्णत: चरितार्थ कर दिया ! क्या किसी देश का लोकतंत्र इतना उदार हो सकता है कि कुछ लोग देश के एक विशेष हिस्से को, एक विशेष भूभाग को देश से अलग करने की सामूहिक घोषणा कर रहे हो और देश धैर्य धरे मौन उनकी मूर्खतापूर्ण अराजकता को सहन कर रहा है वह भी तब जब मात्र एक दिन बाद हम दुनिया के सबसे सुंदर संविधान का स्थापना दिवस ( बर्थ डे ) मनाने की तैयारी मे लगे हो ?  आज दिल्ली मे जो हुआ है उसे केवल हम आप ही नही देख रहे है बल्कि उसपर आज सारी दुनिया की नजर पहुँची है ! आज केवल हम आप ही नही जान पाए है बल्कि पूरी दुनिया जान, समझ, पायी है कि :  1947 मे आजाद हुई हमारी भारत माता की छाती पर गुलामी के कितने गहरे शूल अभी बाकी हैं ?  गद्दारी और बटवारे का सपना पाले कितने...
नई दिल्‍ली पहुंचे ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो, 26 जनवरी परेड में होंगे मुख्य अतिथि नई दिल्‍ली, एजेंसी ।  ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर मेसियस बोलसोनारो अपनी चार दिवसीय यात्रा पर आज नई दिल्‍ली पहुंच गए हैं। वह गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर हिस्सा लेंगे। ब्राजील का राष्ट्रपति बनने के बाद बोलसोनारो की यह पहली भारत यात्रा होगी। उनके साथ उनकी कैबिनेट के आठ मंत्री एंव एक बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ दिल्ली आ रहे हैं। इस दौरान दोनों देशों के बीच 15 समझौते पर हस्ताक्षर होंगे। बता दें कि यह भारत में राष्ट्रपति बोलसोनारो का पहला राजकीय दौरा है। इससे पहले 1996 और 2004 में हमारे गणतंत्र दिवस परेड में ब्राजील के राष्ट्रपति मुख्य अतिथि रह चुके हैं ।  बता दें कि 11वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने बोलसोनारो को गणतंत्र दिवस समारोह का निमंत्रण दिया था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था। उनकी यात्रा का दूसरा दिन कई व्यस्तताओं से भरा हुआ है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बैठक भी शामिल है। इसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में भारत और ब्राज...

गण

गणतन्त्र दिवस (भारत) भारत गणराज्य द्वारा गणतंत् गणतन्त्र दिवस   भारत  का एक राष्ट्रीय पर्व है जो प्रति वर्ष  26 जनवरी  को मनाया जाता है। इसी दिन सन्  1950  को  भारत सरकार अधिनियम (एक्ट)  (1935) को हटाकर  भारत का संविधान  लागू किया गया था। एक स्वतंत्र  गणराज्य  बनने और देश में  कानून  का राज स्थापित करने के लिए संविधान को  26 नवम्बर   1949  को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया और  26 जनवरी  1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया था। 26 जनवरी को इसलिए चुना गया था क्योंकि 1930 में इसी दिन  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  (आई० एन० सी०) ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था। यह भारत के तीन  राष्ट्रीय अवकाशों  में से एक है, अन्य दो  स्‍वतंत्रता दिवस  और  गांधी जयंती  ह

जी करता हैमलंग होकर नाचूं,बेखुदी सी होने लगती है! देशप्रेम की गंगा आँखों से झरवतन की सरजमीं भिगोने लगती है! न जाने कौन सी तासीर है इन तीन रंगों में! कि तिरंगा हाथ में लेते ही सुध-बुध खोने लगती है! आप सभी को 71 वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं! आइए, प्रण लें कि इन दिनों हमारे इस गणतंत्र को छिन्न-भिन्न करने का जो कुत्सित प्रयास किया जा रहा है उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े होकर लड़ेगें और देश की अखंडता की रक्षा करेंगें! कीमत फिर चाहे जो भी हो! जय हिंद! जय भारत!

जी करता है मलंग होकर नाचूं, बेखुदी सी होने लगती है!  देशप्रेम की गंगा आँखों से झर वतन की सरजमीं भिगोने लगती है!  न जाने कौन सी तासीर है इन तीन रंगों में!  कि तिरंगा हाथ में लेते ही सुध-बुध खोने लगती है!  आप सभी को 71 वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं!   आइए,  प्रण लें कि इन दिनों हमारे इस गणतंत्र को छिन्न-भिन्न करने का जो कुत्सित प्रयास किया जा रहा है उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े होकर लड़ेगें और देश की अखंडता की रक्षा करेंगें!  कीमत फिर चाहे जो भी हो!  जय हिंद!  जय भारत!

उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस विशेष : चाहे बनारस के घाट एवम बनारसी साड़ियों का बेहतरीन काम हो, चाहे खुर्जा का जगत प्रसिद्ध पॉटरी का काम (pottery work), चाहे सहारनपुर का लकड़ी का काम हो, चाहे मुरादाबाद के हस्तशिल्प एवम पीतल के बर्ततनो की बेजोड कारीगरी, चाहे बरेली की जरी जरदोजी काम हो, चाहे अलीगढ के ताले, चाहे आगरा का कई कलेवर कई फ्लेवर मे अपनी मिठास से दुनिया को लुभाने वाला पेठा हो, चाहे प्रयागराज संगम नगरी स्थित माघ मेला, और नेतराम की चटपटी कचौडी का देश भर की जुबान पर कायम स्वाद हो, चाहे कानपुर का लैदर, चाहे लखनऊ का चिकन वर्क और नवाबी खाना, चाहे चंदौसी का शुद्ध देसी घी, चाहे कृष्ण नगरी मथुरा के लाजवाब देशी पेडे, चाहे गोरखपुर जिले के गोरखनाथ मंदिर मे महिने भर चलने वाला खिचड़ी मेला, सनातनी ज्ञान - विज्ञान से विश्व को परिचित कराते हुए नैतिकता से जोड़ता हुआ गोरखपुर का गीता प्रेस, एवम गोलघर स्थित अग्रवाल आइसक्रीम वाले की दर्जन भर फ्लेवर मे परोसी जाने वाली आइसक्रीम और मूंग दाल का गरमागरम पकौड़ा हो, या के अयोद्धया नगरी का मनोरम सरयू तट हो !? कला, संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, ज्ञान - विज्ञान, प्रकृति एवम धरोहरो से लबालब भरे हुए हमारे थोडे अक्खड तो थोडे फक्कड प्रदेश, उत्तर प्रदेश में एक बात तो है की इसके किसी भी भूभाग पर हम भ्रमण करने जाएँ, इसके हर उस भूभाग से जुड़ा इसका एक अनोखा एहसास हमे बहुत ही पवित्रता से स्पर्श करते हुए बरबस ही अपनी तरफ आकर्षित करता है, उत्तर प्ररदेश की मेहमान नवाजी एवम खाने - पीने की स्थानीय विशेषताऐ भी इसे विशेष बनाती है ! इन उपरोक्त विशेषताओ के चलते ही इस बात पर गर्व होता है कि : मैं भी उस उत्तर प्रदेश की वासी हूँ , जहां राम और कृष्ण ने जन्म लिया, जहाँ की गंगा जमुनी तहजीब की दुनिया कायल रही है ! सभी को उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस की अशेष बधाई ॥ ================== कलम से : भारद्वाज अर्चिता

उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस विशेष :  चाहे बनारस के घाट एवम बनारसी साड़ियों का बेहतरीन काम हो, चाहे खुर्जा का जगत प्रसिद्ध पॉटरी का काम (pottery work),  चाहे सहारनपुर का लकड़ी का काम हो, चाहे मुरादाबाद के हस्तशिल्प एवम पीतल के बर्ततनो की बेजोड कारीगरी, चाहे बरेली की जरी जरदोजी काम हो, चाहे अलीगढ के ताले, चाहे आगरा का कई कलेवर कई फ्लेवर मे अपनी मिठास से दुनिया को लुभाने वाला पेठा हो, चाहे प्रयागराज संगम नगरी स्थित माघ मेला, और नेतराम की चटपटी कचौडी का देश भर की जुबान पर कायम स्वाद हो, चाहे कानपुर का लैदर, चाहे लखनऊ का चिकन वर्क और नवाबी खाना, चाहे चंदौसी का शुद्ध देसी घी, चाहे कृष्ण नगरी मथुरा के लाजवाब देशी पेडे, चाहे गोरखपुर जिले के गोरखनाथ मंदिर मे महिने भर चलने वाला खिचड़ी मेला, सनातनी ज्ञान - विज्ञान से विश्व को परिचित कराते हुए नैतिकता से जोड़ता हुआ गोरखपुर का गीता प्रेस, एवम गोलघर स्थित अग्रवाल आइसक्रीम वाले की दर्जन भर फ्लेवर मे परोसी जाने वाली आइसक्रीम और मूंग दाल का गरमागरम पकौड़ा हो, या के अयोद्धया नगरी का मनोरम सरयू तट हो !?  कला, संस्कृति, स...

उत्तराखंड में कुछ इस तरह से मनाया जाता है संक्रांति का त्योहार काले कौआ : ले कौवा पुलेणी, मी कें दे भल-भल धुलेणीपूस की कुड़कुड़ा देने वाली ठंड, कितना ही ओढ़ बिछा लो, पंखी, लोई लिपटा लो कुड़कुड़ाट बनी रहती. नाक से भी पानी चूता रहता. नानतिनों की क्या कहें, ठुले जवान बुड़-बाड़ि स्वीटर, फतुई, कुरता, जो पहना हो में नाक रगड़ ही लेते. आद मर्चवानी चाहा की कितली उबलती रहती. ऐसे ही पूस के मासांत की रात या मकर संक्रांन्ति की पुष्यूड़िया मनाया जाता घुघुतिया त्यार. मोटे आटे में घी का मोयन डाल इसे एकसार मसल देते. फिर अंदाजे से गुड़ का पाग मिला सख्त गूँथ लिया जाता. अब इससे बनते खजूरे. खजूरे के साथ ही दाड़िम का फूल, ढाल तलवार, घुघुते, पुलेनि, छोटी पूरी बनाई जाती. सांकल का आकार दे कर मोडा जाता. डमरू जैसा हुड़का भी बनता इनको तलने में डालडा या तेल का उपयोग होता. जैसे ही यह सिक जाते. बड़े स्युड में मोटे धागे या ऊन में इन्हें पिरो कर माला बना ली जाती.पहले भाँग की डोरी में भी पिरोया जाता था बल. माला के बीच बीच में मूंगफली, तालमखाने और बड़े भी पिरोये जाते. नारंगी का दाना भी. घर के हर बच्चे के लिए तो माला बनती ही. भगवान जी के लिए भी चढाई जाती. अगल बगल पडोसी और बिरादरों के साथ माल -मैदान -परदेश गए मित्रों के नाम की भी एक -एक माला बनती. घुघुते की माला इग्यारा, इक्कीस, इकावन, एकसौआठ घुघुतों से बनती. दूसरे दिन सुबह बच्चों का कौतुक होता. घर की छत से या खुले में काले काले की धाल लगा कौवे की पुकार लगती. कौवों की खूब मिन्नत होतीं ढाल, तलवार, पुलेंणी जो भी माला में होता उसे दे उससे मांग भी की जाती. कौओं के लिए अलग से भी लगड़, पूरी, बड़ा रखा जाता. बड़े बूढ़े कहते कि कौवा सुबे सुबे बागेश्वर सरयू में नहा धो के आता है. सरयू के उत्तर वाले इलाके गंगोली, सोर, कुमूँ में काले कऊवा मासांत को मना कर संक्रांति को कौआ बुलाया जाता है. तो सरयू के दक्षिण वाले भाग में संक्रांति के दिन त्यार मना माघ की दो गते सुबे-सुबे कौआ बुलाया जाता है. संक्रांति के दिन का भात तो कौवे के लिए रखा ही जाता है. ह्यून या हेमंत में खूब जाड़ा पड़ता. खेती का काम भी कम होता. घास के पुले और लकड़ी के गट्ठर पहले ही सार लिए जाते. गोठ-भकार हैसियत के हिसाब से भरे रहते. भट्ट, गहत भाँग, गुड़, चुवा, च्यूड़, निम्बू चूक, गदुवा, गड़ेरी घुइयां, तिल बदन की गर्मी बनाये रखने को पूस में खूब खायी जातीं. पूस माह में इतवार को उपवास किया जाता. दूध और नमक नहीं खाते. सूरज दिखने पर उसकी पूजा होती. तब तक आग सेकना, तात पाणि में हाथ लगाना, चाय पीने का भी परहेज होता. मकर संक्रांति के दिन ठया या पूजा घर में चौकी पर लाल वस्त्र बिछा अक्षतों का अष्टदल बना सूर्य भगवान की मूर्ति को स्थापित करते हैं. फिर षोडशोपचार पूजा होती.आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ होता है. घी, चीनी, तिल, मेवे से हवन किया जाता है. “ॐ भगवते सूर्याय, ॐ सूर्याय नमः मंत्र का जाप करते हैं. अन्नम , स्नानं, जपो, होमो देवतानाम च पूजनम, उपवास्तथा दानमेकेंक पावनं स्मृतम. संक्रांति यानि दत्तानि हव्यकव्यानि दातृभि:तानि नित्यं ददात्यक: पुनर्जनमानि जन्मानि.घुघूती त्यार के बारे में एक काथ कुमाऊं के चंदवंशीय राज से भी जुड़ी है. जब राजा कल्याण चंद के पुत्र निर्भय चंद का अपहरण राजा के मंत्री ने कर लिया. निर्भय चंद को लाड़ से घुघूती कहा जाता था. तभी एक कौवे ने कांव-कांव कर घुघूती को छुपाये स्थान का भेद दे दिया. बस राजा ने खुश हो कर कौवों को मीठा खिलाने का चलन शुरू किया और इसे घुघूती त्यार नाम मिला. मकर संक्रांति का दिन इस लिहाज से भी यादगार बन गया। सभी को घुघुतिया त्यौहार की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 साभार -मृगेश पाण्डे काफल ट्री

उत्तराखंड में कुछ इस तरह से मनाया जाता है संक्रांति का त्योहार  काले कौआ : ले कौवा पुलेणी, मी कें दे भल-भल धुलेणी पूस की कुड़कुड़ा देने वाली ठंड, कितना ही ओढ़ बिछा लो, पंखी, लोई लिपटा लो कुड़कुड़ाट बनी  रहती. नाक से भी पानी चूता रहता. नानतिनों की क्या कहें,  ठुले जवान बुड़-बाड़ि स्वीटर, फतुई, कुरता, जो पहना हो में नाक रगड़ ही लेते. आद मर्चवानी चाहा की कितली उबलती रहती. ऐसे ही पूस के मासांत की रात या मकर संक्रांन्ति की पुष्यूड़िया मनाया जाता घुघुतिया त्यार.  मोटे आटे में घी का मोयन डाल इसे एकसार मसल देते. फिर अंदाजे से गुड़ का पाग मिला सख्त गूँथ लिया जाता. अब इससे बनते खजूरे. खजूरे के साथ ही दाड़िम का फूल, ढाल तलवार, घुघुते, पुलेनि, छोटी पूरी बनाई जाती. सांकल का आकार दे कर मोडा जाता. डमरू जैसा हुड़का भी बनता इनको तलने में डालडा या तेल का उपयोग होता. जैसे ही यह सिक जाते. बड़े स्युड में मोटे धागे या ऊन में इन्हें पिरो कर माला बना ली जाती. पहले भाँग की डोरी में भी पिरोया जाता था बल.  माला के बीच बीच में मूंगफली, तालमखाने और बड़े भी पिरोये जाते. नारंगी का दाना भी. घर...