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तो आखिर तुमने पैकअप कर ही लिया नही मानोगे ? तो ˈमै मान लूँ अब कि : फ़ाइनली” finally” मुझे छोड़ करतुम आज चले जा रहे हो ?? अब और नही रूकोगे ना ?? सुनो : जा तो रहे हो पर क्या ! पैकअप करते वक्त तुमने गिना है की : तुमने अपने जर्नी बैग मे मेरे हिस्से की ! कितनी यादें, कितने राज,कितने आंसू, कितने मेरे टूटे सपनेपैक कर लिए है ??सुनो ! मै बोलती कम हूँ,सुनो ! मुझे ! अपनी बात कहने भी नही आती, पर इसका मतलब यह तो नही कि : जब कोई मेरा अपना :मुझे अकेला करके, मुझे छोड़ करकेमुझसे हमेशा के लिए दूर जाने लगे तो : मेरे भीतर कोई टीस, मेरे भीतर कोई दर्द नही होता, किसी अपने के जाने का किसी अपने के बिछडने कादर्द मुझे भी बहुत गहरे तक होता है आखिर यही दर्द तो है जो मेरी भावना के साथ मिलकर मेरी कविता बनता है अर्ची ! वर्ष 2018 तुम्हारे साथ जब कुल 12 माह का साथ रहा है मेरा तो : तुमसे प्यार हो जाना,तुमसे जुडाव हो जाना, तुमसे लगाव हो जाना, बहुत लाजमी है बारह माह ! 12 सौ से भी ज्यादे मेरे सपने कुछ टूटते - बिखरते सपने,कुछ सच होते सपने,कुछ :तिरस्कार - अभाव की भेंट चढ़ गए सपने, सबकी यादें आज मेरी कविता मे समा रही है तुमसे यह कहते हुए : हैप्पी जर्नी वर्ष 2018, सुनो मन पर नही लेना मेरे यह शब्द क्या है कि ! मै गुड बाय नही बोल सकती तुम्हे कलम की चितेरा हूँ मै ! जानती हूँ मै : मेरे कविता संसार में अतीत की यादें क्या महत्व रखती है ???जानती हूँ मै ! कविता मे कभी किसी को आखिरी विदाई नही दी जातीक्योंकि कविता ! यादो की नीव परनवीन - नव जीवन, नवीन - नव सृजन, नवीन नव वर्ष के आरम्भ का दूसरा बदला हुआ नाम है अर्ची जादू जैसा बदला हुआ नाम !!!================================कलम से : भारद्वाज अर्चिता 31/12/2018

तो आखिर तुमने पैकअप कर ही लिया  नही मानोगे ?  तो ˈमै मान लूँ अब कि :  फ़ाइनली” finally” मुझे छोड़ कर तुम आज चले जा रहे हो ??  अब और नही रूकोगे ना ??  सुनो : जा तो रहे हो  पर क्या ! पैकअप करते वक्त  तुमने गिना है की :  तुमने अपने जर्नी बैग मे  मेरे हिस्से की ! कितनी यादें, कितने राज, कितने आंसू, कितने मेरे टूटे सपने पैक कर लिए है ?? सुनो ! मै बोलती कम हूँ, सुनो ! मुझे ! अपनी बात  कहने भी नही आती,  पर इसका मतलब यह तो नही कि :  जब कोई मेरा अपना : मुझे अकेला करके, मुझे छोड़ करके मुझसे हमेशा के लिए दूर जाने लगे तो :  मेरे भीतर कोई टीस,  मेरे भीतर कोई दर्द नही होता,  किसी अपने के जाने का  किसी अपने के बिछडने का दर्द मुझे भी बहुत गहरे तक होता है  आखिर यही दर्द तो है जो  मेरी भावना के साथ मिलकर  मेरी कविता बनता है अर्ची !  वर्ष 2018 तुम्हारे साथ जब  कुल 12 माह का साथ रहा है मेरा  तो : तुमसे प्यार हो जाना, तुमसे जुडाव हो जाना,  तुमसे लगाव हो जाना, बहुत लाजमी है  बारह माह ! 12 सौ ...

मेरा विश्वास मानिए, आपके जितने भी दुश्मन, दोस्त, प्रतिद्वंद्वी, प्रेमी, नफ़रत करने वाले हैं, आज से 40 साल के भीतर ही उनमें से लगभग सब मर चुके होंगे!.. 40 साल भी शायद हमने ज़्यादा बता दिया! शायद 30-35 में ही ज़्यादातर निपट चुके होंगे.. जो बचे भी होंगे, वो आंख, कान, हाथ, पैर, दिमाग़, याद्दाश्त...सब खो चुके होंगे...ये कड़वी सच्चाई है..समय का चक्र है..जरावस्था की हक़ीक़त है..और ये 30-35 साल पलक झपकते गुज़र जाएंगे! ठीक वैसे ही, जैसे अबतक की उम्र गुज़र गई! यहां सब क्षणिक है.. बेहद क्षणिक.. फिर कैसी चिंता, किस बात की फिक्र, कैसा डर, किससे डर, किससे तुलना, किससे प्रतिद्वंद्व, किससे दुश्मनी, किससे द्वेश, किस बात का द्वेश, किससे झिझक, कैसी झिझक...! इसलिए हमेशा मस्त रहें, प्रसन्न रहें, आनंदित रहें, खुशहाल रहे, ऊर्जावान रहें, चहकते रहें, हंसते रहें, हंसाते रहें...अपनी हैसियत अनुसार कभी होटलों में तो कभी खेतों-खलिहानों में, कभी नदी के किनारों पर तो कभी चौराहे के नुक्कड़ों पर, कभी किसी ज़रूरतमंद की मदद करते हुए तो कभी बच्चों के साथ खिलखिलाते हुए, कभी मित्रों के साथ तो कभी परिजनों के साथ, कभी पहाड़ों पर तो कभी झीलों के किनारे... कभी खेल के मैदान में तो कभी चौराहे वाली छोटी सी चाय की दुकान पर अपनी उम्र, पद, रैंक, पेशे इत्यादि झूठे व क्षणिक आवरण को फेंककर अट्ठाहास करके, पूरा मुंह खोलकर, हंस लिया कीजिए... चहक लिया करिए.. मृत्यु तय है.. जीवन बेहद अनिश्चित है.. बेहद छोटा है..

मेरा विश्वास मानिए, आपके जितने भी दुश्मन, दोस्त, प्रतिद्वंद्वी, प्रेमी, नफ़रत करने वाले हैं, आज से 40 साल के भीतर ही उनमें से लगभग सब मर चुके होंगे!.. 40 साल भी शायद हमने ज़्यादा बता दिया! शायद 30-35 में ही ज़्यादातर निपट चुके होंगे.. जो बचे भी होंगे, वो आंख, कान, हाथ, पैर, दिमाग़, याद्दाश्त...सब खो चुके होंगे...ये कड़वी सच्चाई है..समय का चक्र है..जरावस्था की हक़ीक़त है..और  ये 30-35 साल पलक झपकते गुज़र जाएंगे! ठीक वैसे ही, जैसे अबतक की उम्र गुज़र गई!  यहां सब क्षणिक है.. बेहद क्षणिक.. फिर कैसी चिंता, किस बात की फिक्र, कैसा डर, किससे डर, किससे तुलना, किससे प्रतिद्वंद्व, किससे दुश्मनी, किससे द्वेश, किस बात का द्वेश, किससे झिझक, कैसी झिझक...!  इसलिए हमेशा मस्त रहें, प्रसन्न रहें, आनंदित रहें, खुशहाल रहे, ऊर्जावान रहें, चहकते रहें, हंसते रहें, हंसाते रहें... अपनी हैसियत अनुसार कभी होटलों में तो कभी खेतों-खलिहानों में, कभी नदी के किनारों पर तो कभी चौराहे के नुक्कड़ों पर, कभी किसी ज़रूरतमंद की मदद करते हुए तो कभी बच्चों के साथ खिलखिलाते हुए, कभी मित्रों के साथ तो कभी परिजनों के साथ, क...

आज अगर भारत इस महान विप्लवी को उनके जन्मदिवस पर भी याद नहीं कर रहा है तो ये हमारी बदनसीबी है. करतार के बलिवेदी चढ़ने से पहले किसी ने उनसे उनका परिचय पूछा था, तुसी किस दे बन्दे ओ? उन्होंने अपना परिचय बताते हुए कहा था, असी हिन्द दा बंदा (मैं हिन्द का बंदा हूं). मगर अफ़सोस आज 'हिन्द' में कोई उस करतार का स्मरण करने वाला नहीं है. आज करतार सिंह सराभा का जन्म दिवस है, कम से कम आज तो उनका पुण्य-स्मरण कर हम अपने पापों का परिमार्जन कर लें.

देश के युवाओं के लिए भगत सिंह सबसे बड़े आदर्श हैं पर स्वयं भगत सिंह जिन्हें अपना आदर्श मानते थे, उनके बारे में बहुत कम लोग जानतें हैं. भगत का आदर्श कोई बुजुर्ग साधु-संन्यासी, कोई राजनेता या कोई आध्यात्मिक व्यक्तित्व नहीं था, बल्कि साढ़े 19 साल का एक युवक था. भगत अपनी जेब में साढ़े 19 साल के इस युवक की तस्वीर रखा करते थे और उसकी तस्वीर के सामने माल्यार्पण कर अपनी किसी सभा या जलसे की शुरुआत करते थे.  भगत का ये आदर्श पंजाब के लुधियाना के एक छोटे से गांव के धनाढ्य परिवार में जन्मा था. इस युवा के तीनों चाचा सरकारी सेवा में अच्छे पदों पर थे. जब वह अपनी उम्र के 11 वे साल में थे, तब बंगाल में बंग भंग आन्दोलन शुरू हो गया और वहीं से क्रांति और देशप्रेम का बीजारोपण उनके अंदर हुआ. हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए उस बालक ने 1911 में अमेरिका का रुख किया. जहाज से जब अमेरिका की भूमि पर सैन फ्रांसिस्को तट पर कदम रखा तो वहां के अधिकारियों ने बेहद अपमानजनक तरीके से उनकी तलाशी ली और उनके साथ बुरा व्यवहार किया. ऐसा बर्ताव जहाज से आने वाले दूसरे लोगों के साथ नहीं किया जा रहा था तो व...
जादू तुम्हारे लिए बस तुम्हारे लिए :  कुछ लोग जिंदगी के किसी मोड पर अचानक टकराते हैं, और पल भर मे ही ऐसा लगने लगता है जैसे हम उन्हे युगो से जानते हैं ।  ऐसा लगने लगता है जैसे युगो - युगो से उनका ही तो हम इंतजार कर रहे थे !  कुछ लोग तिलिस्मी होते हैं...मतलब बहुत ही सादा और सीधे लेकिन आप न चाहते हुए भी खिंचे चले जाते हैं उनकी तरफ़......।  मैने भी तुम्हे जब पहली बार देखा था जादू बिल्कुल ऐसा ही अपनापन महसूस किया था । है तो यह बहुत ही साधारण सी बात है, पर बहुत मुश्किल भी है .....कितने ही लोगों से आप रोज मिलते हैं, टकराते हैं, देखते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं...लेकिन कुछ लोग कभी-कभी बड़ी ख़ामोशी से क़दम रखते हैं और हो सकता है कि आपकी ज़िंदगी में असल में भी न क़दम रखा हो बल्कि वर्चुअली कहीं टकरा गए हों आपसे और बहुत गहरा प्रभाव छोड़ दिया हो आपके मन पर.. ( जैसे फेसबुक की भीड भरी दुनिया मे अचानक एक दिन तुम मुझसे टकरा गए थे जादू )  कुछ अलग ही आभा होती है ऐसे लोगों की जो छा जाती है आप पर और कितना भी न-न कर लें आप, संभालें नहीं संभाल पाते ख़ुद को.. हालाँकि कई लोग इसे इश्क़ कह सकते ...
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न्यायपालिका किसी भी जनतंत्र के तीन प्रमुख अंगों में से एक है। अन्य दो अंग हैं - कार्यपालिका और व्यवस्थापिका। न्यायपालिका, संप्रभुतासम्पन्न राज्य की तरफ से कानून का सही अर्थ निकालती है एवं कानून के अनुसार न चलने वालों को दण्डित करती है।   विकिपीडिया वीडियो YouTube ·  EDU TERIA 14:08 विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका समझ एक दृष्टि ... 22 जुल॰ 2018 AajTak 4:24 'संसद के महत्व का ख्याल न्यायपालिका को भी रखना ... 28 सित॰ 2018 YouTube ·  Pratham Academy 3:54 न्यायपालिका ।। न्यायपालिका के कार्य ।। upsc ।। upsc prepration ... 15 दिस॰ 2018 YouTube ·  MARGDARSHAN For Civil Services 21:05 न्यायपालिका:प्रमुख कार्य और महत्व Judiciary : Functions and ... 15 अग॰ 2019 YouTube ·  Rapid Study 7:09 भारत की न्यायपालिका, न्यायालय की संरचना _ Judiciary ... 12 दिस॰ 2018 YouTube ·  NewsPlatform 8:02 In Depth: न्यायपालिका की साख को लेकर चिंतित एक जज | Judge ... 21 नव॰ 2019 YouTube ·  NDTV 29:00 Prime Time with Ravish Kumar | प्राइम टाइम : न्यायपालिका की ... 26 अप्रैल 2018

शहीद भगत सिंह ने क्यों कहा कि "मैं नास्तिक हूँ"भगत सिंह का जन्म सितम्बर 1907 में पंजाब में हुआ था और सैंडर्स की हत्या के आरोप में दोषी पाये जाने के कारण 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी | उन्होंने 5,6 अक्टूबर 1931 को लाहौर के सेंट्रल जेल से एक धार्मिक आदमी को जवाब देने के लिये एक निबंध लिखा था जिसने उनके ऊपर नास्तिक होने का आरोप लगाया था | भगत सिंह की उम्र उभगत सिंह को शहीद-ए-आजम के नाम से भी जाना जाता था| वे 12 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी बन गए थे. 13 अप्रेल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके दिमाग पर गहरी चाप छोड़ी थी जिसके कारण वे वीर स्वतंत्रता सेनानी बने और अपने कॉलेज की पढाई छोड़कर भारत की आजादी के लिए 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना कर डाली| जिस प्रकार से उन्होंने ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया उसे भुलाया नहीं जा सकता है|उनका जन्म सितम्बर 1907 में पंजाब में हुआ था और सैंडर्स की हत्या के आरोप में दोषी पाये जाने के कारण 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी | उन्होंने 5,6 अक्टूबर 1931 को लाहौर के सेंट्रल जेल से एक धार्मिक आदमी को जवाब देने के लिये एक निबंध लिखा था जिसने उनके ऊपर नास्तिक होने का आरोप लगाया था | भगत सिंह की उम्र उस समय 23 वर्ष की थी | इस निबंध को 1934 में प्रकाशित किया गया था और इसे युवाओं के बीच बहुत ही जबरदस्त समर्थन मिला था | कॉलेज के विद्यार्थियों ने इस किताब को बहुत पसंद किया था और इसकी बहुत सी प्रतियाँ भी बिकी थीं|उन्होंने लिखा था कि मैं सर्वशक्तिमान परमात्मा को मानने से इंकार करता हूँ, मैं नास्तिक इसलिये नहीं बना कि मैं अभिमानी, पाखंडी या फिर निरर्थक हूँ, मैं ना तो किसी का अवतार हूँ और ना ही ईश्वर का दूत और ना ही खुद परमात्मा | मैं अपना जीवन एक मकसद के लिए न्योछावर करने जा रहा हूँ और इससे बड़ा आश्वासन क्या हो सकता है| ईश्वर में विश्वास रखने वाला एक हिन्दु पुनर्जन्म में एक राजा बनने की आशा कर सकता है, एक मुसलमान या एक इसाई को स्वर्ग में भोगविलास पाने की इच्छा हो सकती है, लेकिन मुझे क्या आशा करनी चाहिए| मैं जानता हूँ कि जिस पल रस्सी का फंदा मेरे गले लगेगा और मेरे पैरो के नीचे से तख्ता हटेगा वो मेरा अंतिम समय होगा, पर किसी स्वार्थ भावना के बिना, यहाँ या यहाँ के बाद किसी पुरस्कार की इच्छा किये बिना मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को आज़ादी के नाम कर दिया हैपर वे ये भी कहते थे कि जब उनको लाहौर केस में पुलिस ने पकड़ लिया था तब भी उनका विश्वास भगवान से नहीं उठा था क्योंकि बचपन में वे पूजा अर्चना करते थे, उनके पिता ने उन्हें पाला था और वे आर्य समाजी थे और उन्ही की वजह से उन्होंने खुद को देश के लिए समर्पित किया था। कॉलेज के समय से वो भगवान के बारे मे सोचते थे और फिर वे एक रेवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हो गए और वहाँ उन्हें सचिन्द्र नाथ सान्याल के बारे में पता चला जिनको क़ाकोरी षड्यंत्र में जेल हुई थी । वहाँ से भगत सिंह के जीवन को एक नया मोड़ मिला और उनको पता चला की किसी भी क्रांतिकारी नेता को अपने विचारों से ही लोगों को प्रभावित करना होता हैं । पर जब उन चारो को फाँसी दे दी गई थी और सारी ज़िम्मेदारीं उनके कंधो पर आ गई , तब उन्हें समझ मे आया कि 'धर्म मानव कमजोरी का परिणाम या मानव ज्ञान की सीमा है' क्योकिं वे चारों जिनको फाँसी हुई थी वे भी धर्म के साथ ही देशभक्ति का प्रचार करते थे फिर भगत सिंह लिखते हैं कि हमारे पूर्वजो को ज़रूर किसी सर्वशक्तिमान अर्थात भगवान में आस्था रही होगी और उस विश्वास के सच या उस परमात्मा के अस्तित्व को जो भी चुनौती देता है, काफ़िर या फिर पाखंडी कहा जाता है| चाहे उस व्यक्ति के तर्क इतने मज़बूत क्यों ना हो कि उन्हें झुठलाना नामुमकिन हो, या उसकी आत्मा इतनी शसक्त क्यों ना हो की उसे ईश्वर के प्रकोप का डर दिखा कर भी झुकाया नही जा सकता है| मैं घमंड की वजह से नास्तिक नहीं बना बल्कि ईश्वर पर मेरे अविश्वास ने आज सभी परिस्तिथियों को मेरे प्रतिकूल बना दिया है और ये स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ सकती है| जरा सा अध्यात्म इस स्थिति को एक अलग मोड़ दे सकता है, लेकिन अपने अंत से मिलने के लिए मैं कोई तर्क देना नही चाहता हूँ|Jagranjoshलाहौर सेंट्रल जेल15 अगस्त 1947 रात 12 बजे ही क्यों भारत को आजादी मिली थी?आगे वे लिखते हैं कि मै यथार्थवादी व्यक्ति हूँ और अपने व्यवहार पर मैं तर्कशील होकर विजय पाना चाहता हूँ, भले ही मैं हमेशा इन कोशिशो में कामियाब नही रहा हूँ, लेकिन ये मनुष्यों का कर्तव्य है कि वो कोशिश करता रहे क्योंकि सफलता तो सहयोग और हालातों पर ही निर्भर करती है| आगे बढ़ते रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिये ज़रूरी है कि वो पुरानी आस्था के सभी सिद्धान्तो में दोष ढूंढे और उसे एक-एक करके सभी मान्यताओं को चुनौती देनी चाहिए, उसे सभी बारीकियों को परखना और समझना चाहिए| अगर कठोर तर्क वितर्क के बाद वो किसी निर्णय तक पहुँचता है तो उसके विश्वास को सरहाना चाहिए| उसके तर्कों को झूठा भी समझा जा सकता हैं, पर ये भी तो संभव हैं की उसे सही ठहराया जाए क्योंकि तर्क ही जीवन का मार्गदर्शक हैं | बल्कि मुझे यह कहना चाहिए की विश्वास होना गलत नही है पर अंधविश्वास बहुत ही घातक हैं | वो एक व्यक्ति कि सोच एवं समझने की शक्ति को मिटा देता हैं और उसे सुधार विरोधी बना देता है जो भी व्यक्ति खुद को यथार्थवादी कहने का दावा करता है, उसे पुरानी मान्यताओं को चुनौती देनी होगी और मेरा मानना हैं कि यदि आस्था तर्क के प्रहार को सहन ना कर पाए तो वो बिखर जाती है| यहाँ पर अंग्रेजों का शासन इसीलिए नहीं है क्योंकि ईश्वर ऐसा चाहता है बल्कि इसलिए है कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने का साहस नहीं है | अंग्रेज़ ईश्वर की मदद से हमें काबू मे नहीं रख रहें हैं बल्कि वो बन्दूको, गोलियों ओर सेना के सहारे ऐसा कर रहें हैं और सबसे ज्यादा हमारी बेपरवाही की वजह से | मेरे एक दोस्त ने मुझसे प्रार्थना करने को कहा, जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात कही तो उसने कहा कि जब तुम्हारें आखरी दिन नज़दीक आएँगे तब तुम यकीन करने लगोगे | तब मैंने कहा नहीं मेरे प्यारे मित्र ऐसा कभी नहीं होगा| मैं इसे अपने लिए अपमानजनक और नैतिक पतन की वजह समझता हूँ, ऐसी स्वार्थी वजहों से मैं कभी भी प्रार्थना नहजानें पहली बार अंग्रेज कब और क्यों भारत आभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के 7 महानायक जिन्होंने आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाईभगत सिंह ने क्यों कहा कि "मैं नास्तिक हूँ"भगत सिंह का जन्म सितम्बर 1907 में पंजाब में हुआ था और सैंडर्स की हत्या के आरोप में दोषी पाये जाने के कारण 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी | उन्होंने 5,6 अक्टूबर 1931 को लाहौर के सेंट्रल जेल से एक धार्मिक आदमी को जवाब देने के लिये एक निबंध लिखा था जिसने उनके ऊपर नास्तिक होने का आरोप लगाया था | भगत सिंह की उम्र उस समय 23 वर्ष की थी|Why Bhagat Singh said that he is an Atheistभगत सिंह को शहीद-ए-आजम के नाम से भी जाना जाता था| वे 12 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी बन गए थे. 13 अप्रेल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके दिमाग पर गहरी चाप छोड़ी थी जिसके कारण वे वीर स्वतंत्रता सेनानी बने और अपने कॉलेज की पढाई छोड़कर भारत की आजादी के लिए 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना कर डाली| जिस प्रकार से उन्होंने ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया उसे भुलाया नहीं जा सकता है|उनका जन्म सितम्बर 1907 में पंजाब में हुआ था और सैंडर्स की हत्या के आरोप में दोषी पाये जाने के कारण 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी | उन्होंने 5,6 अक्टूबर 1931 को लाहौर के सेंट्रल जेल से एक धार्मिक आदमी को जवाब देने के लिये एक निबंध लिखा था जिसने उनके ऊपर नास्तिक होने का आरोप लगाया था | भगत सिंह की उम्र उस समय 23 वर्ष की थी | इस निबंध को 1934 में प्रकाशित किया गया था और इसे युवाओं के बीच बहुत ही जबरदस्त समर्थन मिला था | कॉलेज के विद्यार्थियों ने इस किताब को बहुत पसंद किया था और इसकी बहुत सी प्रतियाँ भी बिकी थीं|उन्होंने लिखा था कि मैं सर्वशक्तिमान परमात्मा को मानने से इंकार करता हूँ, मैं नास्तिक इसलिये नहीं बना कि मैं अभिमानी, पाखंडी या फिर निरर्थक हूँ, मैं ना तो किसी का अवतार हूँ और ना ही ईश्वर का दूत और ना ही खुद परमात्मा | मैं अपना जीवन एक मकसद के लिए न्योछावर करने जा रहा हूँ और इससे बड़ा आश्वासन क्या हो सकता है| ईश्वर में विश्वास रखने वाला एक हिन्दु पुनर्जन्म में एक राजा बनने की आशा कर सकता है, एक मुसलमान या एक इसाई को स्वर्ग में भोगविलास पाने की इच्छा हो सकती है, लेकिन मुझे क्या आशा करनी चाहिए| मैं जानता हूँ कि जिस पल रस्सी का फंदा मेरे गले लगेगा और मेरे पैरो के नीचे से तख्ता हटेगा वो मेरा अंतिम समय होगा, पर किसी स्वार्थ भावना के बिना, यहाँ या यहाँ के बाद किसी पुरस्कार की इच्छा किये बिना मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को आज़ादी के नाम कर दिया है |पर वे ये भी कहते थे कि जब उनको लाहौर केस में पुलिस ने पकड़ लिया था तब भी उनका विश्वास भगवान से नहीं उठा था क्योंकि बचपन में वे पूजा अर्चना करते थे, उनके पिता ने उन्हें पाला था और वे आर्य समाजी थे और उन्ही की वजह से उन्होंने खुद को देश के लिए समर्पित किया था। कॉलेज के समय से वो भगवान के बारे मे सोचते थे और फिर वे एक रेवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हो गए और वहाँ उन्हें सचिन्द्र नाथ सान्याल के बारे में पता चला जिनको क़ाकोरी षड्यंत्र में जेल हुई थी । वहाँ से भगत सिंह के जीवन को एक नया मोड़ मिला और उनको पता चला की किसी भी क्रांतिकारी नेता को अपने विचारों से ही लोगों को प्रभावित करना होता हैं । पर जब उन चारो को फाँसी दे दी गई थी और सारी ज़िम्मेदारीं उनके कंधो पर आ गई , तब उन्हें समझ मे आया कि 'धर्म मानव कमजोरी का परिणाम या मानव ज्ञान की सीमा है' क्योकिं वे चारों जिनको फाँसी हुई थी वे भी धर्म के साथ ही देशभक्ति का प्रचार करते थे ।फिर भगत सिंह लिखते हैं कि हमारे पूर्वजो को ज़रूर किसी सर्वशक्तिमान अर्थात भगवान में आस्था रही होगी और उस विश्वास के सच या उस परमात्मा के अस्तित्व को जो भी चुनौती देता है, काफ़िर या फिर पाखंडी कहा जाता है| चाहे उस व्यक्ति के तर्क इतने मज़बूत क्यों ना हो कि उन्हें झुठलाना नामुमकिन हो, या उसकी आत्मा इतनी शसक्त क्यों ना हो की उसे ईश्वर के प्रकोप का डर दिखा कर भी झुकाया नही जा सकता है| मैं घमंड की वजह से नास्तिक नहीं बना बल्कि ईश्वर पर मेरे अविश्वास ने आज सभी परिस्तिथियों को मेरे प्रतिकूल बना दिया है और ये स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ सकती है| जरा सा अध्यात्म इस स्थिति को एक अलग मोड़ दे सकता है, लेकिन अपने अंत से मिलने के लिए मैं कोई तर्क देना नही चाहता 15 अगस्त 1947 रात 12 बजे ही क्यों भारत को आजादी मिली थी?आगे वे लिखते हैं कि मै यथार्थवादी व्यक्ति हूँ और अपने व्यवहार पर मैं तर्कशील होकर विजय पाना चाहता हूँ, भले ही मैं हमेशा इन कोशिशो में कामियाब नही रहा हूँ, लेकिन ये मनुष्यों का कर्तव्य है कि वो कोशिश करता रहे क्योंकि सफलता तो सहयोग और हालातों पर ही निर्भर करती है| आगे बढ़ते रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिये ज़रूरी है कि वो पुरानी आस्था के सभी सिद्धान्तो में दोष ढूंढे और उसे एक-एक करके सभी मान्यताओं को चुनौती देनी चाहिए, उसे सभी बारीकियों को परखना और समझना चाहिए| अगर कठोर तर्क वितर्क के बाद वो किसी निर्णय तक पहुँचता है तो उसके विश्वास को सरहाना चाहिए| उसके तर्कों को झूठा भी समझा जा सकता हैं, पर ये भी तो संभव हैं की उसे सही ठहराया जाए क्योंकि तर्क ही जीवन का मार्गदर्शक हैं | बल्कि मुझे यह कहना चाहिए की विश्वास होना गलत नही है पर अंधविश्वास बहुत ही घातक हैं | वो एक व्यक्ति कि सोच एवं समझने की शक्ति को मिटा देता हैं और उसे सुधार विरोधी बना जो भी व्यक्ति खुद को यथार्थवादी कहने का दावा करता है, उसे पुरानी मान्यताओं को चुनौती देनी होगी और मेरा मानना हैं कि यदि आस्था तर्क के प्रहार को सहन ना कर पाए तो वो बिखर जाती है| यहाँ पर अंग्रेजों का शासन इसीलिए नहीं है क्योंकि ईश्वर ऐसा चाहता है बल्कि इसलिए है कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने का साहस नहीं है | अंग्रेज़ ईश्वर की मदद से हमें काबू मे नहीं रख रहें हैं बल्कि वो बन्दूको, गोलियों ओर सेना के सहारे ऐसा कर रहें हैं और सबसे ज्यादा हमारी बेपरवाही की वजह से | मेरे एक दोस्त ने मुझसे प्रार्थना करने को कहा, जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात कही तो उसने कहा कि जब तुम्हारें आखरी दिन नज़दीक आएँगे तब तुम यकीन करने लगोगे | तब मैंने कहा नहीं मेरे प्यारे मित्र ऐसा कभी नहीं होगा| मैं इसे अपने लिए अपमानजनक और नैतिक पतन की वजह समझता हूँ, ऐसी स्वार्थी वजहों से मैं कभी भी प्रार्थना नहीं करूँगा !भगत सिंह को लगता था कि स्वार्थी होकर हमें परमात्मा से प्रार्थना नहीँ करनी चाहिए बल्कि खुद को अंग्रेजों के लिए इतना मज़बूत बनाना चाहिए की हम उन लोगों का सामना कर सके !

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शहीद भगत सिंह ने क्यों कहा कि "मैं नास्तिक हूँ" भगत सिंह का जन्म सितम्बर 1907 में पंजाब में हुआ था और सैंडर्स की हत्या के आरोप में दोषी पाये जाने के कारण 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी | उन्होंने 5,6 अक्टूबर 1931 को लाहौर के सेंट्रल जेल से एक धार्मिक आदमी को जवाब देने के लिये एक निबंध लिखा था जिसने उनके ऊपर नास्तिक होने का आरोप लगाया था |  भगत सिंह की उम्र उ भगत सिंह को शहीद-ए-आजम के नाम से भी जाना जाता था| वे 12 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी बन गए थे.  13 अप्रेल, 1919  को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके दिमाग पर गहरी चाप छोड़ी थी जिसके कारण वे वीर स्वतंत्रता सेनानी बने और अपने कॉलेज की पढाई छोड़कर भारत की आजादी के लिए 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना कर डाली| जिस प्रकार से उन्होंने ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया उसे भुलाया नहीं जा सकता है| उनका जन्म सितम्बर 1907 में पंजाब में हुआ था  और सैंडर्स की हत्या के आरोप में दोषी पाये जाने के कारण  23 मार्च 1931  को उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी |   उन्हो...

भगत सिह सुखदेव और राजगुरू

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु से संबंधित कुछ अनजाने तथ्य Nov 07, 2019, Nikhilesh Mishra शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत को आजाद होने में मुख्य भूमिका निभाई थी. इनके बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है.  क्या आप जानते हैं कि इनको तय दिन और समय से 11 घंटे पहले ही फांसी पर चढ़ा दिया गया था. इस दिन को हर वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं. इस लेख में हम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत को याद करते हुए उनसे जुड़े कुछ अनजाने तथ्यों का विवरण दे रहे हैं. भगतसिंह 1 . 8 वर्ष की छोटी उम्र में ही वह भारत की आजादी के बारे में सोचने लगे थे और 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया थाl 2 . भगत सिंह के माता-पिता ने जब उनकी शादी करवानी चाही तो वह कानपुर चले गए थेl उन्होंने अपने माता-पिता से कहा कि “अगर गुलाम भारत में मेरी शादी होगी तो मेरी दुल्हन मौत होगीl” इसके बाद वह “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” में शामिल हो गए थेl 3.  भगत सिंह ने अंग्रेजों से कहा था कि “फांसी के बदले मुझे गोली मार देनी चाहिए” लेकिन अंग्रेजों ने इसे नहीं माना। इसका उल...