नवरात्रि के अपने नौ दिन व्रत अनुष्ठान के बहाने मैने गांधीजी के आमरण अनसन की निज अनुभूति करने के लिहाज से केवल जल पी कर नौ दिन खुद को रखने का प्रयास करना आरम्भ किया दिन रात मिलाकर मै हर रोज कम से कम दो लिटर पानी पी रही हूँ पर आज नौरात्रि के तीसरे दिन ही शाम 5 बजे से मुझे चक्कर आना शुरू हो गया और हाथ पैर मे झनझनाहट भी होने लगी ! परेसानी से निजात पाने के लिए office से घर आने के बाद मैने दो केला खाया एक गिलास दूध लिया तब जाकर 15 मिनट बाद मुझे कुछ आराम महसूस हुआ और मै यह समझ पायी हूँ कि गांधी को बुरा भला कहना, गाली देना लोगो के लिए आसान काम हो सकता है पर गांधी को आचरण मे लाना सहज नही क्योकि गाँधी मात्र एक नाम नही बल्कि एक प्रयोगधर्मी चरित्र है जो हर युग मे महान बना रहेगा अपने त्याग के दम पर !
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कलम से :
भारद्वाज अर्चिता
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि ...
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