लेखक परिचय जोशी १

विस्तार से लेखक परिचय :

                (      फोटो      )

लेखक /प्रेरक वक्ता श्री विभांशु जोशी का जन्म 15 जनवरी सन 1968 को वाराणसी में शिक्षित परिवार में हुआ ! इनकी माता का नाम स्वर्गीय श्रीमती विमला जोशी एवम पिता का नाम स्वर्गीय श्री सुरेश चंद्र जोशी है !
श्री जोशी की सम्पूर्ण शिक्षा मध्यप्रदेश में हुई। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को इन्होने अपना निवास गृह बनाते हुए बहुत कम उम्र मे ही स्वयम को लेखन एवम सामाजिक कार्य की मुख्य धारा से जोड लिया !

प्रधानमंत्री श्री अटल जी की सरकार में राष्ट्रीय बाल भवन, भारत सरकार के बोर्ड मेंबर रहे। वर्ष 2011 में तीन वर्ष के लिये मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य बने। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की लोकसभा चुनाव 1996 की पहली उच्चस्तरीय राष्ट्रीय पेड न्यूज मोनिटरिंग समिति के सदस्य बने।
अनेक समाचार पत्रों में अनवरत स्वतन्त्र लेखन कार्य !
वर्ष 2001 में भारत सरकार के सर्वोच्च "राष्ट्रीय युवा पुरस्कार" से सम्मानित हुए।

मोटिवेशनल स्पीच, स्वस्थ लेखन एवम सामाजिक कार्य हेतु अनेक पुरस्कार से सम्मानित बाल कानून विशेषज्ञ, एडवोकेट, प्रेरक वक्ता, कॉलम लेखक, कलाकार, श्री जोशी वर्तमान समय मे अपने स्माइली लाइव मिशन के तहत देश भर मे मोटिवेशनल स्पीच, मोटिवेशनल सेमिनार द्वारा स्वस्थ युवा स्वस्थ समाज, बचपन बचाओ, बच्चे खुश तो देश खुश, बेटी पढ़े आगे बढ़े, हम फिट तो देश फिट, जैसे विषय पर खुद को केंद्रित करते हुए समाज को नव निर्माण की तरफ ले जाने की पहल कर रहे है ! दुनिया भर की मातृशक्ति को समर्पित इनका स्माइली लाइव क्रिएशन्स हर उम्र - वय के लोगो मे आजकल खासा चर्चित हो रहा है !
इनसे सम्पर्क का माध्यम :
मोबाईल नम्बर : 9302004546
email id vjoshibhopal@gmail.com

Comments

Popular posts from this blog

माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।

“ सब धरती कागद करूँ , लेखनी सब बनराय । सात समुद्र की मसि करूँ , गुरु गुण लिखा न जाय ।” भावार्थ :- यदि सारी धरती को कागज़ मान लिया जाए , सारे जंगल - वनों की लकड़ी की कलम बना ली जाए तथा सातों समुद्र स्याही हो जाएँ तो भी हमारे द्वारा कभी हमारे गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते है ।हमारे जीवन मे हमारे गुरु की महिमा सदैव अनंत होती है अर्ची, गुरु का ज्ञान हमारे लिए सदैव असीम और अनमोल होता है । इस जगत मे बहुत कम ऐसे गुरू हुए है जिनको उनकी अपनी सफलता के साथ साथ ही उनके अपने शिष्य की सफलता से पहचान मिली हो ऐसे ही भाग्यशाली गुरू रहे है “रमाकान्त आचरेकर” जिन्हे पूरी दुनिया सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट कोच “ क्रिकेट गुरू ” के रूप मे जानती है और इसी रूप मे ही सदैव याद भी रखना चाहती है ! ईश्वर के साम्राज्य मे पहुँचने पर आज गुरू आचरेकर का स्वागत नाराण ने निश्चित तौर पर यही कह कर किया होगा “ क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर के गुरू रमाकान्त आचरेकर जी आईए आपका स्वागत है !!” दिवंगत आचरेकर जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !! ================================ Bhardwaj@rchita 03/01/2019

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः गुरु ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के समान हैं. गुरु विष्णु (संरक्षक) के समान हैं. गुरु प्रभु महेश्वर (विनाशक) के समान हैं. सच्चा गुरु, आँखों के समक्ष सर्वोच्च ब्रह्म है अपने उस एकमात्र सच्चे गुरु को मैं नमन करती हूँ, कोटि-कोटि प्रणाम करती हूं !! साभार : भारद्वाज अर्चिता