बेटी घर से भाग गयी, बेटी घर से भाग गयी, की जगह, बेटी घर छोडकर चली गयी, जैसे शब्द का यहाँ प्रयोग किया जा सकता था ! कान पक गए है यह शब्द सुन - सुन कर ! ऐसा लग रहा है जैसे मीडिया जगत, एवम हमारा पुरूष वर्ग, सब अपनी टीआरपी के लिए एक साथ कौरव की भूमिका मे तैयार खडे हो गए हो आज समस्त स्त्री जाति के सम्मान का चीर हरण करने हेतु ! सोच रही हूँ की क्या यह वही आर्याव्रत का शेष अँश भाग है अर्ची जहाँ कभी जनक ने जाति जनित नही योग्यता को वरियता देने के लिए अपनी पुत्री का स्वयम्बर आयोजित किया था ? क्या यह वही भरतखण्डे है जहाँ देवी सावित्री के पिता ने बेटी सावित्री के विवाह योग्य होने पर अपने लिए वर की खोज स्वयम करने की छूट दी थी ? क्या यह वही भारत भूमि है जहाँ गिरधर के प्रेम मे मीरा ने रायदास को अपना गुरू मानकर रजवाडे के छद्म्मी सम्मान को भी लात मारकर गिरधर की नगरी की तरफ कूँच कर लिया था ? क्या यह वही हिन्दूभूमे है जहाँ स्वयम कभी नारायण ने योजना बना कर बहन सुभद्रा को पिता का घर छोडकर अपने प्रिय अर्जुन के साथ हस्तिनापुर की तरफ कूँच कर जाने मे सहयोग किया था ? ================== कलम से : भारद्वाज अर्चिता

बेटी घर से भाग गयी, बेटी घर से भाग गयी, की जगह,
बेटी घर छोडकर चली गयी, जैसे शब्द का यहाँ प्रयोग किया जा सकता था !
कान पक गए है यह शब्द सुन - सुन कर ! ऐसा लग रहा है जैसे मीडिया जगत, एवम हमारा पुरूष वर्ग, सब अपनी टीआरपी के लिए एक साथ कौरव की भूमिका मे तैयार खडे हो गए हो आज समस्त स्त्री जाति के सम्मान का चीर हरण करने हेतु ! सोच रही हूँ की क्या यह वही आर्याव्रत का शेष अँश भाग है अर्ची जहाँ कभी जनक ने जाति जनित नही योग्यता को वरियता देने के लिए अपनी पुत्री का स्वयम्बर आयोजित किया था ?
क्या यह वही भरतखण्डे है जहाँ देवी सावित्री के पिता ने बेटी सावित्री के विवाह योग्य होने पर अपने लिए वर की खोज स्वयम करने की छूट दी थी ?
क्या यह वही भारत भूमि है जहाँ गिरधर के प्रेम मे मीरा ने रायदास को अपना गुरू मानकर रजवाडे के छद्म्मी  सम्मान को भी लात मारकर गिरधर की नगरी की तरफ कूँच कर लिया था ?
क्या यह वही हिन्दूभूमे है जहाँ स्वयम कभी नारायण ने योजना बना कर बहन सुभद्रा को पिता का घर छोडकर अपने प्रिय अर्जुन के साथ हस्तिनापुर की तरफ कूँच कर जाने मे सहयोग किया था ?
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कलम से :
भारद्वाज अर्चिता

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माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।

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