माँ आशियम्मा जो कि एक गृहिणी थीं पर बेहद मजबूत इरादो वाली दूरदर्शी महिला थी कलाम एवम माँ के बीच बहुत मजबूत bonding थी उस Bonding पर स्वयम कलाम साहब ने भी प्रकाश डालते हुए दशकों बाद अपनी किताब “ My Journey ” मे लिखा है “मेरे चार बड़े भाई-बहन और भी थे हम सबकी परवरिस मां बडे सुनियोजित तरीके से कर रही थी हम बच्चों को प्यार से अपने हिस्से का भी खाना खिला देती और खुद भूखी रह जाती हैं। कलाम साहब बचपन से एक अच्छे छात्र थे और हमेशा माँ से सवाल पर सवाल करते रहते नयी नयी जानकारी के लिए उत्सुक रहते थे यथा: यह कैसे हुवा। यह क्यो हुआ? बेटा कलाम के दस साल की उम्र के होने तक सहज स्वभाव वाली उनकी माँ आशियम्मा यह जान चुकी थी कि उनका बेटा विलक्षण प्रतिभा का धनी है इसलिए उन्होने एक दिन पति से कहा हमारे बेटे के लिए हमे हर हाल मे उचित शिक्षा एवम उचित शिक्षण सस्थान मे इसके दाखिले की व्यवस्था करनी होगी ! इस प्रकार माँ के त्याग मिश्रित सहयोग से कलाम Schwartz Higher Secondary School में पढ़ाई करने गए ! और फिर यहाँ से बालक कलाम की जो यात्रा शुरू हुई वह वाया मिसाइल मैन की उपाधि धारण करते हुए 25 जुलाई वर्ष 2002 मे भारतीय गणतन्त्र के 11वे राष्ट्रपति बनते हुए भारतरत्न सम्मान प्राप्त करने तक अनवरत चलती रही !
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि ...
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