अब देश की तरक्की के लिए हमारी युवा शक्ति को
कुछ अलग सोचने एवम करने की जरूरत
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दुनिया विकास के लिए तेजी से विज्ञानं की तरफ जा रही है और यह विज्ञान एक नए अनन्त की खोज है! यह नया अनन्त भी भारतीय वैदिक परम्परा एवम भारतीय युवा शक्ति के सहयोग के बिना पूर्ण नही हो सकता इसलिए भारतीय युवा शक्ति से आग्रह है (अब कुछ अलग सोचो ) यह विचार अर्चिता के नही बल्कि अर्चिता के दार्शनिक गुरू भारत के युवा चिन्तनशील कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द जी के है वह भी लगभग 126 वर्ष पूर्व के ! विवेकानन्द ने स्पस्ट कर दिया था दुनिया के सारे मतभेद इस दुनिया को विभिन्न नजरिए से देखने की वजह से है, कहने का अर्थ हमे अपनी अनुभूतियो के कारण सब कुछ अलग अलग दिखता है परन्तु सारा कुछ एक मे ही समाया है और वह है हमारे राष्ट्र एवम हमारे जीवन की विकास यात्रा ! युवा शक्ति को इस देश की उन्नति एव विकास के लिए कुछ अलग सोचने के साथ ही निन्दा दोष के खेल खेलने से भी बचना होगा क्योकि इस दुषित खेल से हमारी तरक्की के मार्ग मे अवरोध आएगा जिससे युवा शक्ति अपना और अपने राष्ट्र की विकास गति धीमी करने का वाहक बन जाएगी जो की विश्व शान्ति के साथ - साथ राष्ट्र शान्ति एवम स्वयम युवा शक्ति की सेहत के लिए भी हानिकारक है !
प्रकृति के नियम के समान ही मानव समाज में भी एक नियम लागू होता है सुनिश्चित लक्ष्य एवम विकास का नियम ! सुनिश्चित लक्ष्य के अभाव में मानव समाज युवा शक्ति एवम राष्ट्र तीनो की प्रगति रुक जाती है ! इसके वपरित सामने यदि स्थिर लक्ष्य हो तो इन तीनो के आगे बढ़ने का प्रयास सफल तथा सार्थक होता है हमारे आज के जीवन के हर क्षेत्र में यह बात हमारे लिए स्मरणीय होनी चाहिए,अपितु अपना लक्ष्य निर्धारित करने के पूर्व भी ! स्वामीजी ने इस बात पर सर्वाधिक बल दिया है कि : देश की शाश्वत परंपरा तथा आदर्शों के प्रति युवा शक्ति के सचेत न होने पर विश्रृंखलापूर्ण समृद्धि आएगी संभवत: यह समृद्धि राष्ट्र को प्रगति के स्थान पर अधोगति की ओर ही ले जाएगी !
विशेषकर आज के युवा वर्ग को, जिसमें देश का भविष्य निहित है, और जिसमें जागरण के चिह्न दिखाई दे रहे हैं, प्रत्येक युवा को अपने जीवन का एक उद्देश्य ढूँढ लेना चाहिए। हमें ऐसा प्रयास करना होगा ताकि युवाओ के भीतर जगी हुई प्रेरणा तथा उत्साह ठीक पथ पर संचालित हो। अन्यथा शक्ति का ऐसा अपव्यय होगा जो विनाश का वाहक बन जाएगा, विवेकानंद ने चेताया है कि : भौतिक उन्नति तथा प्रगति अवश्य ही वांछनीय है, परंतु देश जिस अतीत से भविष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, उस अतीत को अस्वीकार करना निश्चय ही निर्बुद्धिता का द्योतक है। अतीत की नींव पर ही राष्ट्र का निर्माण करना होगा।
युवा वर्ग में यदि अपने विगत इतिहास के प्रति कोई चेतना न हो, तो उनकी दशा प्रवाह में पड़े एक लंगर हीन नाव के समान होगी सभी जानते है ऐसी नाव कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकती इस महत्वपूर्ण बात को सदैव स्मरण रखना होगा।
मान लो कि हम युवा आगे बढ़ते जा रहे हैं, पर यदि हम किसी निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर नहीं जा रहे हैं, तो हमारी प्रगति निष्फल रहेगी। आधुनिकता कभी - कभी हमारे समक्ष चुनौती के रूप में आ खड़ी होती है। इसलिए भी यह बात हमें विशेष रूप से याद रखनी होगी। इसी उपाय से आधुनिकता के प्रति वर्तमान झुकाव को देश के भविष्य के लिए उपयोगी एक लक्ष्य की ओर सुपरिचालित किया जा सकता है ! उन्नति की प्रथम सीढ़ी स्वाधीनता है, स्वाधीनता के अभाव में हम बद्ध हो जाते हैं और इससे क्रमशः हमारा विनाश तय हो जाता है इसीलिए युवकों को पूर्ण स्वाधीनता देनी होगी, उनके पथ निर्धारण में सहायता भी करनी होगी। स्वामी जी के विचारो से पूर्ण इत्तेफाक रखते हुए मैने भी पाया है “ अतीत की नींव को बिना सुदृढ़ किए भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता, अतीत से जीवन शक्ति ग्रहण करके ही भविष्य जीवित रहता है, जिस आदर्श को लेकर राष्ट्र अब तक बचा हुआ है, उसी आदर्श की ओर वर्तमान युवा पीढ़ी को परिचालित करना होगा, ताकि वे देश के महान अतीत के साथ सामंजस्य बनाकर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो !
मै तो यह भी मानती हूँ कि : आधुनिकता जब भी हमारे सामने एक बडी चुनौती के रूप में आ खड़ी होती है इसका तात्पर्य यह है कि आधुनिक समाज राष्ट्रहित के लिए उसकी शक्ति का उपयोग करना नही सीख पा रहा है , अत: तरुणों “ युवा वर्ग ” के प्रति स्वामीजी का खुला आह्वान रहा है अपनी शक्ति को व्यर्थ मे बरबाद न होने देना, अतीत की ओर देखो, जिस अतीत ने तुम्हें अनंत जीवन रस प्रदान किया है, उससे तुम पुष्ट होओ यदि अतीत की परंपरा का सदुपयोग कर सको, उसके लिए गौरव का बोध कर सको, तो फिर उसका अनुसरण कर अपना पथ निर्धारित करो वह परंपरा तुम्हें दृढ़ नींव पर प्रतिष्ठित करेगी और इसके फलस्वरूप तुम देखोगे कि : देश सामंजस्यपूर्ण समृद्धि की दिशा में अग्रसर हो रहा है।
इसी प्रकार अपेक्षाकृत अत्यल्प समय के भीतर ही तुम सब अपने लक्ष्य तक पहुँच सकोगे। यह पूर्ण सत्य है कि : वैज्ञानिक गण नए - नए उपायों से नई खोज में तरह - तरह के परीक्षण - निरीक्षण किया करते हैं, परंतु वे भी क्या उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त अतीत काल की प्रज्ञा पर निर्भर नहीं करते ? हमे मनन करना होगा अणु का आविष्कार आकस्मिक रूप से नहीं हो गया अनेक युगों के अनेक वैज्ञानिकों की जी - तोड़ खोजों के बाद अंततः वर्तमान शताब्दी में आण्विक शक्ति के अस्तित्व का पता चला है। उसी प्रकार इस क्षेत्र में भी हमें अपने पूर्ववर्तियों के प्रयास को स्मरण रखना होगा।
मानव एवम राष्ट्र उन्नति की प्रथम सीढ़ी स्वाधीनता है युवको को चाहिए नए विचारो की कसौटी पर खरा उतरने के लिए युगों से संचित अनुभवों के भंडार से दृष्टांत लेकर लाभ उठाएँ और अपने राष्ट्र के साथ - साथ सम्पूर्ण मानव समाज को उन्नति पथ पर ले जाए इस बोध एवम विश्वास के साथ कि : “ अपने वर्तमान दायित्व व महान उत्तराधिकार को स्वीकार करना हम युवा शक्ति का परम कर्तव्य है !”
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कलम से :
भारद्वाज अर्चिता
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि ...
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