किताबों के खूबसूरत धरातल से ब्लागिंग की गलियों में आने में जमाने को जितना समय लगा था उससे बहुत ही कम समय में तो वह फेसबुक, ट्विटर, टिंडर और इंस्टाग्राम से हांफ हूंफ कर टिक टॉक पर आ गया है। ब्लागिंग के अच्छे दिनों में एक दोस्त ने लिखा था कि यह सदी घर से भागे हुए लोगों की है। जड़ से उखड़े लोगों की। लगता है कि आने वाले कुछ दशक तो जड़विहीन लोगों के होंगे। उथले, उथले से दिन और छितरी छितरी रातों जैसे लोग। खैर छोड़ो, बताना तो यह चाहता था कि यह खेतों के सबसे खूबसूरत मौसमों में से एक है। जब सरसों, चने और गेहूं के खेत हाथों में हाथ डाल जवान हो रहे हैं। और छत पर सूखने डाल दी गयी रजाइयां इन दिनों सर्दियों के किस्से, गर्मियों से साझा करती हैं।
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माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि ...
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