ज़फ़रनामा की राष्ट्रवादी समीक्षा :
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“भारत में पत्रों की कहानी अर्चिता की जुबानी” कॉलम के अंतर्गत इस कॉलम के दूसरे चरण की शुरुआत मैने युवाओं के चरित्र निर्माण को ध्यान मे रखते हुए कुछ आदर्श ऐतिहासिक पत्रों की स्वस्थ समीक्षा के साथ आरम्भ किया है जिसके अन्तरगत मेरे आज के ऐतिहासिक पत्र का मौजू है 1706 मे खिदराना युद्ध के बाद ज़फ़रनामा के नाम से दसम गुरू गोविंद सिंह जी महराज द्वारा औरंगज़ेब को लिखे गए विजय पत्र की मेरे द्वारा की गयी “राष्ट्रवादी समीक्षा ” का भाग दो ! ऐतिहासिक पत्र “ज़फ़रनामा” पर मेरे द्वारा कुछ विशेष लिखने का आग्रह मेरे रेगुलर पाठकों ने किया है !
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माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। [दोहा] पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि, सहस सारदा सेष।।235।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायिनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।। [छंद] मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मंदिर चली।। [सोरठा] जानि गौरि अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।
माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति अयोध्याकाण्ड जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि ...
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