शहर-ए-फ़िराक़

मेरी एक रचना !
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बहुत जले हैं हम
फ़िराक़ तेरे शहर में
सियाह शहर हो गयी
जिंदी मेरी
फ़िराक़ तेरे शहर में !!

सुने थे चर्चे बहुत हम
फ़िराक़ तेरे शहर के
फूलों की सेज पर हंसती है जिंदगीं
फ़िराक़ तेरे शहर में
जिंदगी की क्या बात करें
मौत के लिए रोएं हैं
होके जार - जार
हम फ़िराक़ तेरे शहर में !!

फूलों का भरम पाले हुए
चलते रहे बहुत दूर तक अंगारों पर,
पड़े हैं छाले बहुत नाकामियों के
पांवों में मेरे फ़िराक़ तेरे शहर में,
बहुत जलें हैं हम फ़िराक़ तेरे शहर में !!

डंसते रहे उम्र भर जो
मिले वो आस्तीन के सांप बहुत
दोस्त की शक्ल में
फ़िराक़ तेरे शहर में
मौत से भी बद्तर हो गयी
जिंदगी फ़िराक़ तेरे शहर में,
बहुत जलें हैं हम फ़िराक़ तेरे शहर में !!

बर्बादी की कजा ( मौत ) से
मांगते रहे हम भीख जिंदगी की
और मिलती रही :
भाड़ में जाने की सलाह हमें
फ़िराक़ तेरे शहर में,
टूटे है इस कदर हम फ़िराक
तेरे शहर में ....
कि : लिए सिसकियों को दामन में
कहतें हैं आज अलविदा हम
फ़िराक तेरे शहर को ,
बहुत जलें हैं हम फिराक तेरे शहर में !!
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कलम से :
भारद्वाज अर्चिता

मेरी यह रचना 12 मई 2005 को गुरूवारीय जागरण में प्रकाशित हो चुकी है ! बड़े भईया ( DrHari Om) आपको याद होगा यह गोरखपुर में उथल - पुथल वाला दौर था और मैं फ़िराक के शहर याने के ग़ज़ल , कविता, कहानी, में भी राजनीति देख कर भेद - भाव देखकर घबरा रही थी ! युवा अवस्था की पहली दहलीज़ पर थी मैं उम्र कम थी पर अपने गर्म शहर के भीतर होने वाली उथल-पुथल को ठीक ठीक समझ पा रही थी,मैने यह रचना उसी उथल - पुथल को केन्द्र में रख कर किया था !!

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