हर कदम पर ठुकरा रहे हो ....?

हर कदम पर ठुकरा रहे हो !
किसी रोज ! अजनबी की तरह मिलूं
तो न कहना !!

अश्क आंखों में मेरी जो सजा रहे हो
किसी रोज दरिया होकर मिलूं तो न कहना !!

गुरूर इतना न करो अर्ची की
गुस्ताखिंया हो जाएं
गुस्ताखी माफ ना करूं तो न कहना !!

इक उम्मीद पर चली हूं ! हां बस इक उम्मीद पर
खंजर स्वार्थ का पीठ में न उतारो
मौत की नीद सो जाऊं तो फिर न कहना !!

अभी तो सफर तय हुआ था
अभी तो मीलों साथ चलना था
राह ! राह ! राह - ना बदलो
मैं किसी और राह भटक जाऊं तो ना कहना !!

कलम से :
भारद्वाज अर्चिता
09919353106

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