आज रामायण पढते हुए दो पात्र - चरित्र पर मैं ठहर गयी


लगभग दो माह से दोहरे काम के दबाव के चलते एवम अपनी आदत के विपरित जाकर बहुत ज्यादे बोलने,  मोबाईल पर बात-चीत का लम्बा दौर झेलने के बाद मै एक - दो - दिनो से मानसिक स्तर पर खुद को बहुत थका हुआ पा रही थी ......
एक पुरानी आदत है मेरी की जब मै मानसिक स्तर पर थकान महसूस करती हूँ तब गीता की सरण मे जाती हूँ या फिर बाबा तुलसी कृत रामचरितमानस के पन्नो मे झाँकती हूँ आज भी कुछ ऐसा ही किया थकान और कान मे अचानक दर्द शुरू हो जाने की वजह से शाम  5.40 पर ही छुट्टी लेकर office से घर आ गई और कुछ देर आराम करने के बाद आज फिर बाबा तुलसी कृत रामचरितमानस के पन्नो को खोला एवम
पढते हुए मै अपनी सोच के मानक पर रखकर इसके दो पात्रों पर मनन करने लगी यथा :

बाबा तुलसी कृत  रामचरितमानस
में दो पात्र-चरित्र आते हैं "एक विभीषण और एक कैकेयी" दोनों के आचरण अपने परिवेश के विपरित थे,
विभीषण रावण के राज मे रहता था फिर भी नही बिगडा और कैकेयी राम के राज मे रहती थी फिर भी नही सुधरी..........
मेरा तात्पर्य है कि : सुधरना एवं बिगडना केवल मनुष्य की सोच और स्वभाव पर निर्भर करता है माहौल पर नहीं.......,,
रावण सीता को समझा समझा कर हार गया था पर सीता ने रावण की तरफ एक बार देखा तक नहीं,
मंदोदरी ने उपाय बताया कि तुम राम बन के सीता के पास जाओ वो तुम्हें जरूर देखेगी,

रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर चुका हूं ,
तब मंदोदरी ने पूछा- क्या सीता ने आपकी ओर देखा..???
रावण का उत्तर था मैं खुद सीता को नहीं देख सका..,
क्योंकि मैं जब - जब राम बनता हूँ, मुझे परायी नारी अपनी माता और अपनी पुत्री सी दिखती है....,
आज रामायण पढते हुए अचानक इन दो पात्रों पर मैं  ठहर गयी और मुझे ऐसी अनुभूति हुई कि :
हम भी अपने अंदर राम को ढूंढे,और उनके चरित्र का अनुकरण करें निस्चित रूप से हमारे जीवन में कभी कहीं किसी रावण का समावेश नही होगा !!

कलम से :
भारद्वाज अर्चिता

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